सिंधु घाटी सभ्यता(Indus Valley Civilization) Indian History | - JANGIR ACADEMY | Online Study Portal

Friday, September 4, 2020

सिंधु घाटी सभ्यता(Indus Valley Civilization) Indian History |

  सिंधु घाटी सभ्यता(Indus Valley Civilization)

सिंधु घाटी सभ्यता(Indus Valley Civilization)


परिचय:-

- भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से प्रारंभ होता है जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता हैं।
- यह सभ्यता लगभग 2500 ईस्वी पूर्व दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग मैं फैली हुई थी,जो कि वर्तमान में पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत के नाम से जाना जाता है।
- 1920 में, भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा किये गए सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से हड़प्पा तथा मोहनजोदडो जैसे दो प्राचीन नगरों की खोज हुई।- भारतीय पुरातत्त्व विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने सन 1924 में सिंधु घाटी में एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा की।
- सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र,मेसोपोटामिया,भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं से     अधिक उन्नत थी।

 सिंधु घाटी सभ्यता के चरण

       ((  

  1. (1) प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता (3300ई.पू.-2600ई.पू. तक)
- विशेषताएं:- एक केंद्रीय इकाई का होना तथा बढते हुए नगरीय गुण
- व्यापार क्षेत्र विकसित हो चुका था और खेती के साक्ष्य भी मिले हैं। उस समय मटर,तिल,खजूर,रुई आदि की खेती होती थी।
- प्रारंभिक हड़प्पाई चरण ‘हाकरा चरण’ से संबंधित है, जिसे घग्गर- हाकरा नदी घाटी में चिह्नित किया जाता  है।

- हड़प्पाई लिपि का प्रथम उदाहरण 3000 ई.पू के समय का मिलता है।
  1. (2) परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता (2600ई.पू-1900ई.पू. तक)
- कोटदीजी नामक स्थान परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के चरण को प्रदर्शित करता है।
- परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के आने तक प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता बड़े- बड़े नगरीय केंद्रों में परिवर्तित हो चुकी थी। जैसे- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में तथा लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।
  1. उत्तर हड़प्पाई सभ्यता (1900ई.पु.-1300ई.पू. तक)
- सिंधु घाटी सभ्यता के क्रमिक पतन का आरंभ 1800 ई.पू. से माना जाता है,1700 ई.पू. तक आते-आते हड़प्पा सभ्यता के कई शहर समाप्त हो चुके थे । परंतु प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में भी इसके तत्व देखे जा सकते हैं।
- कुछ पुरातात्त्विक आँकड़ों के अनुसार उत्तर हड़प्पा काल का अंतिम समय 1000 ई.पू. - 900 ई. पू. तक बताया गया है।

 सिंधु घाटी सभ्यता की नगरीय योजना और विन्यास-

* अन्न भंडारों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता के नगरों की प्रमुख विशेषता थी।
- हड़प्पाई सभ्यता अपनी नगरीय योजना प्रणाली के कारण जानी जाती है।
- मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगरों में दुर्ग थे जो नगर से कुछ ऊँचाई पर स्थित होते थे जिसमें उच्च वर्ग के लोग निवास करते थे ।
- दुर्ग से नीचे सामान्यतः ईंटों से निर्मित नगर होते थे,जिनमें सामान्य लोग निवास करते थे।
ग्रिड प्रणाली:- हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत सडकें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं, उसे ग्रिड प्रणाली के नाम से जाना जाता था।
- हड़प्पा सभ्यता में जल निकासी प्रणाली बहुत प्रभावी थी। हर छोटे और बड़े घर के अंदर स्वंय का स्नानघर और आँगन होता था।
- जली हुई ईंटों का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी क्योंकि समकालीन मिस्र में मकानों के निर्माण के लिये शुष्क ईंटों का प्रयोग किया गया था | 

सिंधु घाटी सभ्यता की कृषि प्रणाली -

- सिंधु सभ्यता के मनुष्यों ने सर्वप्रथम कपास की खेती प्रारंभ की थी।
- गेहूँ, जौ, सरसों, तिल, मसूर आदि का उत्पादन होता था।
- गुजरात के कुछ स्थानों से बाजरा उत्पादन के संकेत भी मिले हैं,जबकि यहाँ चावल के प्रयोग के संकेत तुलनात्मक रूप से बहुत ही दुर्लभ मिलते हैं।
 - खुदाई से बैलों से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
- नहरों के अवशेष केवल हड़प्पाई स्थल शोर्तुगई अफगानिस्तान में पाए गए हैं | 
- हड़प्पाई लोग कृषि के साथ -साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन करते थे ।
- सिंधु घाटी सभ्यता मे घोड़े के साक्ष्य सूक्ष्म रूप में मोहनजोदड़ो और लोथल की एक संशययुक्त टेराकोटा की मूर्ति से मिले हैं।हड़प्पाई संस्कृति किसी भी स्थिति में अश्व केंद्रित नहीं थी।

सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था-


- हड़प्पाई लोग पत्थर ,धातुओं, सीप या शंख का व्यापार करते थे।
- धातु मुद्रा का प्रयोग नहीं होता था। व्यापार की वस्तु विनिमय प्रणाली मौजूद थी।
- बहुत संख्या में मिली मुहरें ,एकसमान लिपि,वजन और मापन की विधियों से सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों      के जीवन में व्यापार के महत्त्व के बारे में बताती है।
- हड़प्पाई प्राचीन ‘लैपिस लाजुली’ मार्ग से व्यापार करते थे 
- दजला -फरात नदियों की भूमि वाले क्षेत्र से हड़प्पा वासियों के वाणिज्यिक संबंध थे।

सिंधु घाटी सभ्यता की 

शिल्पकला -

- हड़प्पाई कांस्य की वस्तुएँ निर्मित करने की विधि से भली भाँति परिचित थे।
- तांबा राजस्थान की खेतड़ी खान से प्राप्त किया जाता था और टिन अफगानिस्तान से लाया जाता था ।
- बुनाई उद्योग में प्रयोग किये जाने वाले ठप्पे बहुत सी वस्तुओं पर मिले हैं।
- टेराकोटा की मूर्तियों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता की महत्त्वपूर्ण शिल्प विशेषता थी।
- हड़प्पाई नाव बनाने की विधि,मनका बनाने की विधि,मुहरें बनाने की विधि से भली- भाँति परिचित थे।
- जौहरी वर्ग सोने ,चांदी और कीमती पत्थरों से आभूषणों का निर्माण कार्य करते थे ।
- मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि पूर्णतः प्रचलन में थी,हड़प्पा वासियों की स्वयं बर्तन बनाने की विधियाँ थीं,      हड़प्पाई लोग चमकदार बर्तनों का निर्माण करते थे ।

धर्म-


- हड़प्पाई लोग पृथ्वी को उर्वरता की देवी के रूप मे पूजा करते थे, जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की पूजा देवी के रूप में करते थे ।
- टेराकोटा की लघुमूर्तियों पर एक महिला का चित्र पाया गया है, इनमें से महिला के गर्भ से उगते हुए पौधे को दर्शाया गया है।
- पुरुष देवता के रूप में मुहरों पर तीन शृंगी चित्र पाया गया हैं जो योगी की मुद्रा में बैठे हुए हैं। देवता के एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा तथा उनके सिंहासन के पीछे भैंसा का चित्र बना है। उनके पैरों के पास दो हिरनों के चित्र चित्रित है। चित्रित भगवान की मूर्ति को पशुपतिनाथ महादेव की संज्ञा दी गई है।
- पत्थरों पर लिंग तथा स्त्री जनन अंगों के चित्र पाए गए हैं।
- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वृक्षों तथा पशुओं की पूजा किया करते थे।
 * सिंधु घाटी सभ्यता में सबसे महत्त्वपूर्ण पशु एक सींग वाला गैंडा था तथा दूसरा महत्त्वपूर्ण पशु कूबड़ वाला सांड था।- अत्यधिक मात्रा में ताबीज भी प्राप्त हुये हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन का कारण - 

-सिंधु घाटी सभ्यता का लगभग 1800 ई.पू. में माना जाता है,परंतु उसके पतन के कारण अभी भी विवादित हैं।
- एक मत यह कहता है कि इंडो -यूरोपियन जनजातियों जैसे- आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण कर दिया तथा उसे हरा दिया ।
- बहुत से पुरातत्त्वविद सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण प्राकर्तिक मानते हैं।
- एक अन्य कारण यह भी माना जाता है कि नदियों द्वारा अपना मार्ग बदलने के कारण खाद्य उत्पादन क्षेत्रों में बाढ़ आ गई ।

प्रमुख स्थल :-

(1) बलूचिस्तान

 - दक्षिणी बलूचिस्तान में सैंधव सभ्यता के कई पुरास्थल स्थित हैं जिसमें 'मकरान तट' है। मकरान तट प्रदेश पर मिलने वाले अनेक स्थलों में से पुरातात्विक दृष्टि से केवल 4 स्थल महत्त्वपूर्ण हैं-

(1) सुत्कागेनडोर (दश्क नदी के मुहाने पर)
(2) सुत्काकोह (शादीकौर के मुहाने पर)
(3) बालाकोट (विंदार नदी के मुहाने पर)
(4) डावरकोट (सोन मियानी खाड़ी के पूर्व में विदर नदी के मुहाने पर)

(2) उत्तर पश्चिमी सीमांत

- यहाँ सारी सामग्री, 'गोमल घाटी' से प्राप्त होती है जो अफ़ग़ानिस्तान जाने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मार्ग है। 'गुमला' जैसे स्थलों पर सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेपों के ऊपर सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

(3) सिंध

- इनमें कुछ स्थल प्रसिद्ध हैं जैसे - 'मोहनजोदड़ों', 'चन्हूदड़ों', 'जूडीरोजोदड़ों', (कच्छी मैदान में जो कि सीबी और जैकोबाबाद के बीच सिंधु की बाढ़ की मिट्टी का विस्तार है) 'आमरी' (जिसमें सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेप के ऊपर सिंधु सभ्यता के निक्षेप मिलते हैं) 'कोटदीजी', 'अलीमुराद', 'रहमानढेरी', 'राणाधुडई' इत्यादि।

(4) पश्चिमी पंजाब

 '- डेरा इस्माइलखाना', 'जलीलपुर', 'रहमानढेरी', 'गुमला', 'चक-पुरवानस्याल' आदि महत्त्वपूर्ण पुरास्थल है।

(5) बहावलपुर

- यहाँ के स्थल सूखी हुई सरस्वती नदी के मार्ग पर स्थित हैं। इस मार्ग का स्थानीय नाम का ‘हकरा‘ है । किन्तु इस क्षेत्र में अभी तक किसी स्थल का उत्खनन नहीं हुआ है। इस स्थल का नाम 'कुडावाला थेर' है जो प्रकटतः बहुत बड़ा है।

(6) राजस्थान

- इस क्षेत्र में सरस्वती नदी को 'घघ्घर' कहा जाता है। कुछ प्राचीन दृषद्वती नदी के सूखे हुए मार्ग के साथ- साथ भी है जिसे अब 'चैतग नदी' कहा जाता है। इस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल 'कालीबंगा' है। कालीबंगा नामक पुरास्थल पर भी पश्चिमी से गढ़ी और पूर्व में नगर के दो टीले, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ों, की भांति विद्यमान है। राजस्थान के समस्त सिंधु सभ्यता के स्थल आधुनिक गंगानगर ज़िले में आते हैं।

(7) हरियाणा

- हरियाणा का महत्त्वपूर्ण सिंधु सभ्यता स्थल हिसार ज़िले में स्थित 'बनवाली' है। इसके अतिरिक्त 'मिथातल', 'सिसवल', 'वणावली', 'राखीगढ़', 'वाड़ा तथा 'वालू' नामक स्थलों का भी उत्खनन किया जा चुका है।
 * राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में स्थित एक गांव है, जो सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा पुरातात्विक स्थल माना जाता है।

(8) पूर्वी पंजाब

- इस क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण स्थल 'रोपड़ संधोल' है। हाल ही में चंडीगढ़ नगर में भी हड़प्पा संस्कृति के निक्षेप पाये गये हैं। इसके अतिरिक्त 'कोटलानिहंग ख़ान', 'चक 86 वाड़ा', 'ढेर-मजरा' आदि पुरास्थलों से सैंधव सभ्यता से सम्बद्ध पुरावशेष प्राप्त हुए है।

(9) गंगा-यमुना दोआब

- यहाँ के स्थल मेरठ ज़िले के 'आलमगीर' तक फैले हुए हैं। एक अन्य स्थल सहारनपुर ज़िले में स्थित 'हुलास' तथा 'बाड़गांव' है। हुलास तथा बाड़गांव की गणना पश्वर्ती सिन्धु सभ्यता के पुरास्थलों में की जाती है।

(10) जम्मू

- इस क्षेत्र के मात्र एक स्थल का पता लगा है, जो 'अखनूर' के निकट 'भांडा' में स्थित है।

(11) गुजरात

 - गुजरात के 'कच्छ', 'सौराष्ट्र' तथा गुजरात के मैदानी भागों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्घित 22 पुरास्थल मिले  है, जिसमें से 14 कच्छ क्षेत्र में तथा शेष अन्य भागों में स्थित है। गुजरात प्रदेश में ये पाए गए प्रमुख पुरास्थलों में 'रंगपुर', 'लापेथल', 'पाडरी', 'प्रभास-पाटन', 'राझदी', 'देशलपुर', 'मेघम', 'वेतेलोद', 'भगवतराव', 'सुरकोटदा', 'नागेश्वर', 'कुन्तासी', 'शिकारपुर' तथा 'धौलावीरा' आदि प्रमुख है।

(12) महाराष्ट्र

- महाराष्ट्र प्रदेश के 'दायमाबाद' नामक पुरास्थल से मिट्टी के ठीकरे प्राप्त हुए है महाराष्ट्र और दायमादाबद नामक स्थान से प्राप्त हुआ है - इसमें 'रथ चलाते मनुष्य', 'सांड', 'गैंडा', और 'हाथी' की आकृति प्रमुख है। यह सभी ठोस धातु की है और वजन कई किलो है, इसकी तिथि के विषय में विद्धानों में मतभेद है।

(13) अफ़ग़ानिस्तान

- हिन्दुकश के उत्तर में अफ़ग़ानिस्तान में स्थित 'मुंडीगाक' और 'सोर्तगोई' दो पुरास्थल प्राप्त हुये है। मुंडीगाक का उत्खनन 'जे.एम. कैसल' द्वारा किया गया था तथा सोर्तगोई की खोज एवं उत्खनन 'हेनरी फ्रैंकफर्ट' द्वारा कराया गया था। सोर्तगोई लाजवर्द की प्राप्ति के लिए बसायी गयी व्यापारिक बस्ती थी।

काल निर्धारण

- रेडियो कार्बन ‘सी-14‘ जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू. को माना गया है।
- दिसम्बर 2014 में भिर्दाना को अबतक का खोजा गया सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे प्राचीन नगर माना गया है।
- इतिहासकारों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के निर्माता द्रविड़ लोग थे। मोहनजोदड़ो से सूती कपड़े के उपयोग के प्रमाण मिले हैं इसका मतलब वे कपास की खेती के बारे में जानते थे

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